Friday, June 19, 2009

Desperado

उम्र जलवों में बसर हो यह ज़रूरी तो नही
हर शब् ग़म की सहर हो ये ज़रूरी तो नही


नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी सकती है
उनकी आगोष में सर हो ये ज़रूरी तो नही

आग को खेल पतंगों ने समझ रखा है
सब को अंजाम का डर हो ये ज़रूरी तो नही

शेख करता है जो मस्जिद में खुदा को सजदे
इसके सजदों में असर हो ये ज़रूरी तो नही

सब की सकी पे नज़र हो ये ज़रूरी है मगर
सब पे सकी की नज़र हो ये ज़रूरी तो नही

कोई दिल में लिये अरमान चला जाता है
कोई खोये होय औसान चला जाता है


हुस्न वालो से यह कहदो के निकले बहिर
देखने वालो का इमान चला जाता है


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