Friday, November 06, 2009

सूरज ..

दूर पहाड़ी के पीछे से झांकता सुबह का लाल सुनहरा सूरज, कुछ पुराना सा दोस्ताना लगता है। बचपन में भी मेरे घर क पास वाले पथरीले पहाड़ से अलसाया सा जगता था, अपने रौशनी भरे हाथों से मुझे सहलाता, कुनकुनी धुप मेरे चेहरे पर मलता और दिन के सफ़र पर निकल जाता। शाम को जब मैं स्कूल से आता, तब सूरज भी वापिस आने को होता। पर उसके आने के पहले उसके दोस्त भी आते। वो लाल और नारंगी बादलों के साथ महकती हवा भी होती। फिर हम अपने दिन का हिसाब लिया दिया करते थे, मैंने कितने अक्षर याद किए और उसने कितने बादलों को रास्ता दिखाया। मैं उसे देख कर खुश होता और वो मेरी बातों पर खिलखिलाता था। कुछ देर के खेल के बाद फिर वो सब धुन्धलके में चले जाते। अगली सुबह वापिस मिलने के लिए। आज बरसो बाद फिर से इस दूसरी पहाडी के ऊपर दिखा है। एहसास पुराना सा ही है पर दूरियां कुछ बढ़ गयी हैं, सालों न मिलने से कुछ हिचकिचाहट सी आ गयी है। पहाड़ी से झांकते हुए उसने मुझे देखा फिर उस टेलीफोन के नए टावर के पीछे छुपता हुआ अपने सफ़र पर निकल गया।

कल फिर मिलने आऊंगा, देखूंगा की कब तक मुझसे नजरें बचाता है। कब तक उसे सुबह और शाम की वो बचकानी बातें याद नही आती, जब हम दोनों एक दुसरे को अपने दिन के किस्से सुनाया करते थे। कुछ रूठा है तो क्या हुआ, मना ही लूँगा, दोस्त है जाएगा कहाँ।

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