Sunday, November 08, 2009

किताब का आखिरी अक्षर

बरसों से जेहन में कुलबुलाता एक ख्याल है। बहुत से दुसरे ख्यालों के बीच डूबता उतरता हुआ। कभी एकदम दबा हुआऔर कभी फूट पड़ने को बेताब। कभी अकेला सहमा हुआ सा और कभी अपने साथ सैकड़ों ख्यालों के तार जोड़े हुए।जब भी उथले में होता तो मैं उसका खाका पन्नो पर खीचने की कोशिश करता, ताकि उसे सही से पहचान पाऊं और शायद दूसरो को दिखा पाऊं। बरसों तक झलक देख देख कर उस अनकहे ख्याल की तस्वीर बनाने की कोशिश की है पर इतने वक्त से इस अधूरे ख्याल से शायद कुछ अनजाना सा इश्क हो गया है उसकी उमर होने को है पर फ़िर भीउसे छोड़ते नही बनता। इस ख्याल का अंजाम क्या होना चाहिए। कुछ ऐसा जो इतने सच्चे इश्क का फलसफा कहलाने के काबिल हो। या फ़िर डरता हूँ की उस खाली जगह को भरने के लिए दूसरा ख्याल कहाँ से लाऊंगा लाखकोशिशों पर भी किताब का वो आखिरी अक्षर लिखा नही जाता है

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