Thursday, March 17, 2011

मैं अब भी बादलों में चेहरे देखता हूँ



वो लगता तो मेरा है पर हर वक़्त दूर जाने की जिद करता है. जिसे इतने वक़्त से अपने ख्यालों की चाभियाँ दे रखी थी वो भीड़ में गुम जाने की बातें करता है। कैसे रोकूँ और क्या समझाउं की अब सारी शर्तें बेमानी है. जो कुछ चंद बरसों का करार हमने किया था वो अब के हाल पर लागु नहीं होता. अनजाने चेहरों के बीच उसे देखने की आदत ही नहीं है. गर वो ऐसे गया तो हमेशा के लिए एक याद बन कर रह जायेगा। उसके साथ ही जाएँगी वो चाभियाँ भी। और फिर कोई मेरे जेहन में चाह कर भी नहीं झांक पायेगा।

जब चौंक कर नीद से जागता हूँ तो लगता है की वो हमेशा से एक ख्याल ही था। शायद मैंने अपने वजूद के दरवाजे यूंही किसी अजनबी के लिए खोल दिए थे। और हर उस पल का मलाल होता है जिसमे वो शामिल था।

जब नींद कुछ छंटती है और दिमाग कुछ काम करने लायक होता है तो लगता है कि शायद यही सही है। वो उतना ही मासूम है जैसा की पहली बार मुझे दिखा था।

मैं ही हूँ जो कि धुंधली रौशनी के अनजाने सायों में तारों कि चादर से मोती चुनने कि कोशिश करता हूँ। सारी नादानियाँ मेरी ही हैं जो कि मैं अब भी बादलों में चेहरे देखता हूँ।

4 comments:

Anonymous said...

dis id surabhi..:-( duuno how the comment got published by 'anonymous

Anonymous said...

how can u write so beautifully...such complicated stuff expressed with simplicity..

Prashant said...

byproduct of brain mashing :)

Singh said...

you rock...

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