Saturday, July 30, 2011

अभ्युदय

photo: #viewsfromthebalcony - the 50 second window right before the sun sets.


जब तुम पिछली बार हँसते हुए अलविदा कह कर गए थे
जब तुमने इस नीली चादर को अपने रंगों से उन्मादित किया था

हमने सांध्यिका गाकर तुम्हे क्षितिज से मिलते हुए देखा था
इस विश्वास में की तुम पुनः जग आह्लादित करने आओगे

इस कालरात्रि के बाद तुम्हे जब स्वर्ण उदय होना था
दुहःस्प्नो के शीत धरातल पर नव प्रारभ्दों के बीज बोना था

एक प्रहर हुआ तुम नहीं आये प्राची अभी दूषित है
तुम्हे ग्रहण कर दम्भित प्रतीची अभी भी कलुषित है

मेघों की किनारियाँ जो पक़ कर सुनहरी होनी थीं अब काली हो चली हैं
तुमसे पहले आया निशांत अब उषा को ढांढ्स बंधाते थकने लगा है

सोनपक्षियों के स्वागत कलरव अब टिटिहरी के तीखे स्वरों से विषाक्त हो चुके है
तुम्हारा पथ बुहारने आयी पुरवाई अंध बवंडर बन बह रही है

तुम अपने अंतर्द्वंदों से क्यों घिर कर सब को भूल चले हो
स्वयं स्वारथ संतापों में क्यों तुम अंतरमग्न हुए हो

तुम्हे नहीं है समय व्यर्थ ही विचलित होने का
तुम्हे नहीं अधिकार व्यथित हो अपना संबल खोने का

अब आदित्य दूर क्षितिज की नींद से जागो और पुत्र धर्म निर्वाह करो
स्वयं व्यथा के काल सिन्धु से निकल विवास्वत खुद अपना तुम मान रखो

संगी साथी छोड़ दिवाकर तुम एक अकेले आते हो
ईशानो के मध्य मार्ग पर किन्तु तुम्ही चल पाते हो

आत्म क्लेष के गरल अँधेरे रोज़ रात को आते हैं
पुनः उदित हो करे सवेरा वो ही सूरज कहलाते हैं