Sunday, February 12, 2012

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मुंह अँधेरे जब ना तो रात होती है ना ही सुबह, सूरज रौशनी की गाड़ी सजा रहा होता है और चाँद तारे चादर में समेट ले जाने की तयारी कर रहा होता है. पूरब ना तो लाल हुआ है और ना ही पछिम में अँधियारा बचा हो. 

ऐसे में सब एक रंग में दीखते हैं, एक बराबर, अधजगे अलसाये से. ना कोई आगे ना पीछे. फिर सूरज निकला रौशनी आयी एक के हिस्से धुप हुयी और दुसरे के हिस्से छाँव आयी.

1 comment:

Anonymous said...

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